Friday, 20 January 2012

भगवान् के अवतारोका वर्णन—(Bhagwaan Ke Avataro Ka Varnan)

तीसरा अध्याय 
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भगवान् के अवतारोका
वर्णन  
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श्रीसूतजी कहते है:—सृष्टिके आदिमे भगवान् ने लोकोके निर्माणकी  इच्छा की | इच्छा होते हि उन्होने महतत्व आदिसे निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया | उसमे दस इन्द्रिया,एक मन और पांच भुत—ये सोलह कलाए थी ||१|| उन्होंने कारण-जलमे शयन करते हुए जब योगनिंद्राका विस्तार किया ,तब उनके नाभि-सरोवरमेंसे एक कमल प्रगट हुआ और उस कमलसे प्रजापतियोंके अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ||२|| भगवान् के उस विराटरूप के अंग-प्रत्यांग्मे ही समस्त लोकोकी कल्पना की गयी है,वह भगवान् विशुध्ध सत्वमय श्रेष्ट रूप है ||३|| योगी लोग दिव्यदृष्टि से भगवान् के उस रूपका दर्शन करते है | भगवानके वह रूप हज़ारो पैर,जांघे ,भुजाये और मुखोके कारण अत्यंत विलक्षण है ; उसमे सहस्र सिर , हज़ारो कान,हज़ारो आँखे और हज़ारो नासिकाए है | हज़ारो मुकुट,वस्त्र और कुंडल आदि आभूषण से वह उल्लासित रहता है ||४|| भगवान् का यही पुरुष रूप ,जिसे नारायण कहते है ,अनेक अवतारों का अक्षय कोष है—इसीसे सारे अवतार प्रगट होते है | इस रूपके छोटे-से-छोटे अंश से देवता,पशु-पक्षी और मनुष्यादी योनियोकी सृष्टि होती है ||५||
उन्ही प्रभुने पहले कौमारसर्ग में सनक,सनंदन , सनातन और

Monday, 2 January 2012

भगवत्कथा और भगवद्भक्ति का माहात्म्य—(Bhagwat Katha Aur Bhagwad Bhakti Ka Mahatmya)

दूसरा अध्याय 
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भगवत्कथा और भगवद्भक्ति का माहात्म्य 

श्री व्यास जी कहते है:—शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियो के ये प्रश्न सुनकर रोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाको बड़ा ही आनंद हुआ | उन्होंने ऋषियों के इस मंगलमय प्रश्नका अभिनन्दन करके कहना आरम्भ किया ||१|| 

सूतजीने कहा:— जिस समय श्री शुकदेवजी का यज्ञोपवित भी नहीं हुआ था ,सूत्र लौकिक-वैदिक कर्मोके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था ,उन्हें अकेलेही संन्यास लेनेके उद्देश्य से जाते देखकर उनके पिता vyasji  विरह्से कातर होकर पुकारने लगे —"बेटा ! बेटा" उस  समय तन्मय होने के कारण श्रीशुकदेवजी की ओर से वृक्षोने उत्तर दिया | ऐसेसबके हृदयमे बिराजमान श्री शुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ ||२||  यह श्रीमद्भागवत अत्यंत गोपनीय—रहस्यात्मक पुराण है | यह भगवत्स्वरूप का अनुभव कराने वाला और समस्त वेदोका सार है | संसारमे फसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते है,उनके लिए आध्यात्मिक तत्वोको प्रकाशित करानेवाल यह एक अद्वितीय दीपक है | वास्तवमे उन्हिपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोके आचार्य श्रीशुकदेवजिने इसका वर्णन किया है | मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ ||३|| मनुश्योमे सर्वश्रेष्ट भगवान् के अवतार नर-नारायण