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Saturday, 3 March 2012

महर्षि व्यासका असंतोष-Maharshi Vyaaska Asantosh

चौथा अध्याय 
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महर्षि व्यासका असंतोष
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व्यास जी कहते है— उस दीर्घकालीन सत्रमें सम्मिलित हुए मुनियोमे विद्या-वयोवृध्ध कुलपति ऋग्वेदी शौनकजीने सुतजीकी पूर्वोक्त बात सुनकर उनकी प्रशंसा की और कहा ।।१।।
     शौनकजी बोले—सूतजी ! आप वक्ताओमे श्रेष्ट है तथा बड़े भाग्यशाली है । जो कथा भगवान् श्रीशुकदेवजीने कही थी ,वाही भगवानकी पुण्यमयी कथा कृपा करके आप हमें सुनाइये ।।२।। वह कथा किस  युगमें,किस स्थान पर और किस कारण से हुई थी ? मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायनने किसकी प्रेरणना से इस परमहंसो की संहिता का निर्माण किया था ? ।।३।। उनके पुत्र शुकदेवजी बड़े योगी,समदर्शी,भेदभाव-रहित,संसार-निंद्रासे जगे एवं निरंतर एकमात्र परमात्मामे ही स्थित रहते है । वे छिपे रहनेके कारण मूढ़-से प्रतीत होते है ।।४।। व्यासजी जब संन्यासके लिये वनकी ओर जाते हुए अपने पुत्रका पीछा कर रहे थे ,उस समय जलमे स्नान करनेवाली स्त्रियोने नंगे शुकदेवको देखकर तो वस्त्र धारण नहीं किया ,परन्तु वस्त्र पहने हुए व्यासजी को देखकर लज्जासे कपडे पहन लिये थे ।  इस आश्चर्यको देखकर जब व्यासजीने उन स्त्रियोंसे इसका कारण पूछा , तब उन्होंने उत्तर दिया की ' आपकी दृष्टिमें तो अभी स्त्री-पुरुषका भेद बना हुआ है, परन्तु आपके पुत्रकी शुध्ध दृष्टिमे यह भेद नहीं है' ।।५।। कुरुजांगल देशमे पहुचकर हस्तिनापुर में वे पागल, गूंगे

Friday, 20 January 2012

भगवान् के अवतारोका वर्णन—(Bhagwaan Ke Avataro Ka Varnan)

तीसरा अध्याय 
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भगवान् के अवतारोका
वर्णन  
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श्रीसूतजी कहते है:—सृष्टिके आदिमे भगवान् ने लोकोके निर्माणकी  इच्छा की | इच्छा होते हि उन्होने महतत्व आदिसे निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया | उसमे दस इन्द्रिया,एक मन और पांच भुत—ये सोलह कलाए थी ||१|| उन्होंने कारण-जलमे शयन करते हुए जब योगनिंद्राका विस्तार किया ,तब उनके नाभि-सरोवरमेंसे एक कमल प्रगट हुआ और उस कमलसे प्रजापतियोंके अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ||२|| भगवान् के उस विराटरूप के अंग-प्रत्यांग्मे ही समस्त लोकोकी कल्पना की गयी है,वह भगवान् विशुध्ध सत्वमय श्रेष्ट रूप है ||३|| योगी लोग दिव्यदृष्टि से भगवान् के उस रूपका दर्शन करते है | भगवानके वह रूप हज़ारो पैर,जांघे ,भुजाये और मुखोके कारण अत्यंत विलक्षण है ; उसमे सहस्र सिर , हज़ारो कान,हज़ारो आँखे और हज़ारो नासिकाए है | हज़ारो मुकुट,वस्त्र और कुंडल आदि आभूषण से वह उल्लासित रहता है ||४|| भगवान् का यही पुरुष रूप ,जिसे नारायण कहते है ,अनेक अवतारों का अक्षय कोष है—इसीसे सारे अवतार प्रगट होते है | इस रूपके छोटे-से-छोटे अंश से देवता,पशु-पक्षी और मनुष्यादी योनियोकी सृष्टि होती है ||५||
उन्ही प्रभुने पहले कौमारसर्ग में सनक,सनंदन , सनातन और

Monday, 2 January 2012

भगवत्कथा और भगवद्भक्ति का माहात्म्य—(Bhagwat Katha Aur Bhagwad Bhakti Ka Mahatmya)

दूसरा अध्याय 
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भगवत्कथा और भगवद्भक्ति का माहात्म्य 

श्री व्यास जी कहते है:—शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियो के ये प्रश्न सुनकर रोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाको बड़ा ही आनंद हुआ | उन्होंने ऋषियों के इस मंगलमय प्रश्नका अभिनन्दन करके कहना आरम्भ किया ||१|| 

सूतजीने कहा:— जिस समय श्री शुकदेवजी का यज्ञोपवित भी नहीं हुआ था ,सूत्र लौकिक-वैदिक कर्मोके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था ,उन्हें अकेलेही संन्यास लेनेके उद्देश्य से जाते देखकर उनके पिता vyasji  विरह्से कातर होकर पुकारने लगे —"बेटा ! बेटा" उस  समय तन्मय होने के कारण श्रीशुकदेवजी की ओर से वृक्षोने उत्तर दिया | ऐसेसबके हृदयमे बिराजमान श्री शुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ ||२||  यह श्रीमद्भागवत अत्यंत गोपनीय—रहस्यात्मक पुराण है | यह भगवत्स्वरूप का अनुभव कराने वाला और समस्त वेदोका सार है | संसारमे फसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते है,उनके लिए आध्यात्मिक तत्वोको प्रकाशित करानेवाल यह एक अद्वितीय दीपक है | वास्तवमे उन्हिपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोके आचार्य श्रीशुकदेवजिने इसका वर्णन किया है | मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ ||३|| मनुश्योमे सर्वश्रेष्ट भगवान् के अवतार नर-नारायण

Monday, 26 December 2011

श्रीसूतजीसे शौनकादिक ऋषियोका प्रश्न -(Shree Sutji Se Shaunkadik Rishyoka Prashna)

ॐ तत्सत   
श्रीगणेशाय नमः
श्रीमद्भागवत महापुराण 
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प्रथम स्कंध   
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पहला अध्याय
श्रीसूतजीसे शौनकादिक ऋषियोका प्रश्न 
मंगलाचरण 
जिससे इस जगतकी सृष्टि ,स्थिति और प्रलय होते है---- क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थोमें अनुगत है और असत पदार्थोसे पृथक है ; जड़ , नहीं चेतन है ; परतंत्र नहीं , स्वयंप्रकाश है ; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं प्रत्युत उन्हें अपने संकल्प से ही जिसने उस वेदज्ञानका दान किया है; जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते है; जैसे तेजोमय सूर्य रश्मियोंमें जलका, जलमे स्थलका और स्थलमे जलका भ्रम होता है , वैसे ही जिसमे यह त्रिगुणमयी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टी मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान-सत्तासे सत्यवत  प्रतीत हो रही है , उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और माया कार्यसे पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्माका हम ध्यान करते है ||१|| महामुनि व्यासदेवके द्वारा निर्मित इस श्रीमद्भागवत महापुराणमें मोक्षपर्यंत फलकी कामनासे रहित परम धर्मका निरूपण हुआ है | इसमें शुध्धान्तःकरण सत्पुरुषोके जाननेयोग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्माका निरूपण हुआ है, जो तीनो तापोका जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देने वाली है | अब और किसी साधन या शास्त्रसे क्या प्रयोजन | जिस समय भी सुकृति पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते है , इश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदयमे आकर बंदी बन जाता है ॥२॥ रस के मर्मज्ञ भक्तजन ! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका

Thursday, 22 December 2011

Dhundhukari Ko Pret Yoni Ki Prapti Aur Usse Udhdhar

धुन्धुकारी को प्रेत योनी की प्राप्ति और उससे उद्धार 

 सूतजी कहते है:-- शौनकजी ! पिता के वन चले जाने पर धुन्धुकारी ने अपनी माता को बहुत पिटा और कहा --"बता,धन कहा रखा है ? नहीं तो अभी तेरी जलती लाठी से खबर लूँगा" ||१|| उसकी इस धमकी से डरकर और पुत्र के उपद्रवो से दुखी होकर वह रात्रि को कुए में जा गिरी और इसीसे उसकी मृत्यु हो गयी ||२||  योगनिष्ट गोकर्णजी तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए | उन्हें  इस घटनाओ से कोई सुख या दुःख नहीं होता था ;क्योंकि उनका न कोई मित्र था न कोई शत्रु ||३|| 

धुन्धुकारी पांच वेश्याओके साथ घर में रहने लगा | उनके लिए भोग-सामग्री जुटानेकी चिंताने उसकी बुध्धि   नष्ट कर दी और वह नाना प्रकार के अत्यंत क्रूर कर्म करने लगा ||4|| एक दिन उन कुलटाओने उससे बहुत-से गहने मांगे | वह तो काम से अँधा हो रहा था ,मौत की उसे कभी याद नहीं आती थी |  बस,उन्हें जुटाने के लिए घर से निकल पड़ा  ||५||  वह जहाँ-तहाँसे बहुत-सा धन चुराकर घर लौट आया तथा उन्हें कुछ सुन्दर वस्त्र और आभूषण लाकर दिये ||६|| चोरीका बहुत मॉल देखकर रात्रि के समय स्त्रियोने विचार किया की " यह नित्य ही चोरी करता है,इसलिए इस किसी दिन अवश्य राजा पकड़ लेगा ||७|| राजा सारा धन छिनकर निश्चय ही प्राणदंड देगा | जब एक दिन इसे मरना ही है , तब हम ही धन की रक्षा के लिये गुप्तरूपसे इसको क्यों न मार डाले ||८|| इसे मारकर हम इसका माल-मत्ता लेकर जहाँ-कहीं चली जायेंगी |" एसा निश्चय कर उन्होंने सोये हुए धुन्धुकारीको रसियो से कस दिया और उसके गलेमे फाँसी लगाकर उसे मारने का प्रयत्न किया |  इससे जब वह जल्दी नहीं मरा,तो उन्हें बड़ी चिंता हुई ||९-१०|| तब उन्हों ने उसके मुखपर बहुत-से दहकते अंगारे डाले; इससे वह अग्निकी लपटों से छटपटाकर मर गया ||११|| उन्हों ने उसके शरीर को एक गड्ढे में डालकर गाड़ दिया | सच है स्त्रीया प्रायः बड़ी दुह्सहासी होती है | उनके इस कृत्या का किसीको भी पता न चला ||१२||  लोगोके पूछनेपर कह देती थी की हमारे प्रियतम पैसे के लोभ में अबकिबार कही  दूर चले गए है,इसी वर्ष के अन्दर लौट आयेंगे ||१३|| बुध्धिमान पुरुष को दुष्ट स्त्रियों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए  | जो मुर्ख इनका विश्वास करता है,उसे दुखी होना पड़ता है ||१४|| इनकी वाणी तो कामियोके हृदयमे रसका संचार कृति है; किन्तु ह्रदय छुरे की धारके तरह तीक्ष्ण होता है | भला,इन स्त्रियोंको कौन प्यारा है ? ||१५||   

वे  कुलटाये धुन्धुकारी की साड़ी सम्पति समेटकर वहांसे चम्पत हो गयी;उनके ऐसे न जाने कितने पति थे | और धुन्धुकारी अपने कुकर्मोके कारण भयंकर प्रेत हुआ ||१६|| वह बवंडरके  रूप में दसो दिशाओमे में भटकता रहता था तथा शीत-घामसे संतप्त और भूख-प्याससे व्याकुल होनेके कारण  " हा देव ! हा देव ! " चिल्लाता रहता  था  | परन्तु उसे कहीं भी कोई आश्रय न मिला | कुछ काल बीतने पर गोकर्ण ने भी लोगोके मुख से धुन्धुकारी की मृत्युका समाचार सुना ||१७-१८|| तब उसे अनाथ समज कर उन्होंने उसका गयाजी में श्राद्ध किया ;और भी जहाँ-जहाँ वे जाते थे ,उसका श्राद्ध अवश्य करते थे ||१९||

इस प्रकार घूमते-घूमते गोकर्ण जी अपने नगर में आये और रात्रिके समय दुसरो की दृष्टी से बचकर सीधे अपने घरके आँगन में सोने के लिये पहुंचे ||२०||  वहां अपने भाईको सोया देख आधी रात के समय धुन्धुकारिने अपना बड़ा विकट रूप दिखाया ||२१|| वह कभी भेड़ा,कभी हाथी,कभी भैसा , कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता |  अंत में वह मनुष्य के आकर में प्रगट हुआ ||२२|| ये अवस्थाए देखकर गोकर्ण ने निश्चय किया की यह कोई दुर्गति को प्राप्त हुआ जीव है | तब उन्हों ने उसे धैर्यपूर्वक पूछा ||२३||

गोकर्ण ने कहा:-- तू  कौन है ? रात्री के समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है ? तेरी यह दशा कैसे हुई ? हमें बता तो सही ---तू प्रेत है,पिसाच है  अथवा कोई राक्षस है ? ||२४||
सूतजी कहते है:-- गोकर्ण के इस प्रकार पूछने पर वह बार-बार जोर-जोरसे  रोने लगा | उसमे बोलने की शक्ति नहीं थी ,इसलिए उसने केवल संकेतमात्र किया ||२५|| तब गोकर्ण ने अंजलि में जल लेकर उसे अभिमंत्रित करके उसपे छिड़का | इससे उसके कुछ पापो का शमन हुआ और वह इस प्रकार कहने लगा ||२६||
प्रेत बोला:--"मैं तुम्हारा भाई हूँ | मेरा नाम है धुन्धुकारी |  मैंने अपने ही दोषोसे अपना ब्राह्मणत्व नष्ट कर दिया ||२७||  मेरे कुकर्मो की गिनती नहीं जा सकती |  मैं तो महँ अज्ञान में चक्कर काट रहा था | इसीसे मैंने लोगो की बड़ी हिंसा की |  अंतमे कुलटा स्त्रियोने मुझे तडपा-तड़पाकर मार डाला ||२८|| इसीसे अब प्रेत-योनिमे पड़कर यह दुर्दशा भोग रहा हूँ | अब दैववश कर्मफल का उदय होने से मैं केवल वायुभक्षण कर के जी रहा हूँ ||२९||  भाई ! तुम दया के समुद्र हो ; अब किसी प्रकार जल्दी ही मुझे इस योनी से छुडाव |"  गोकर्ण ने धुन्धुकारी की सारी बाते सुनी और तब उससे  बोले ||३०||  
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    गोकर्ण ने कहा:-- भाई ! मुझे इस बात का बड़ा आश्चर्य  है --- मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजिमे पिंडदान किया,फिर भी तुम प्रेतयोनि से मुक्त कैसे नहीं हुए ? ||३१|| यदि गया श्राध्द से नही तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई , तब इसका और कोई उपाय ही नहीं है | अच्छा, तुम सब बात खोलकर कहो-- मुझे अब क्या करना चाहिए ? ||३२||

प्रेत ने कहा:--मेरी मुक्ति सेकड़ो गया-श्राध्द करने से भी नहीं हो सकती |  अब तो तुम इसका कोई और उपाय सोचो ||३३||
प्रेत की यह बात सुनकर गोकर्ण जी को बड़ा आश्चर्य हुआ | वे कहने लगे---यदि सेकड़ो गया-श्राध्द से भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती ,तब तो तुम्हारी मुक्ति असंभव ही है ||३४|| अच्छा , अभी तो तुम निर्भय होकर अपने स्थान पर रहो ; मैं विचार करके तुम्हारी मुक्तिके लिए कोई दूसरा उपाय करूँगा ||३५||
गोकर्ण की आज्ञा पाकर धुन्धुकारी वहां से अपने स्थानपर चला आया | इधर गोकर्ण जी ने रातभर विचारकिया, तबभी उन्हें कोई उपाय नहीं सुझा ||३६|| प्रातः  काल उनको आया देख लोग प्रेमसे उनसे मिलने आये | तब गोकर्ण ने रातमे जो कुछ जिस प्रकार हुआ था, वह सब उन्हें सुना दिया ||३७||  उनमे जो लोग विद्वान् , योग्निष्ट , ज्ञानी और वेदज्ञ थे , उन्हों ने भी अनेको शास्त्रोको उलट-पलट कर देखा; तो भी उसकी मुक्ति का कोई उपाय न मिला ||३८|| तब सब ने यही निश्चय किया की इस विषय में सूर्यनारायण जो आज्ञा करे, वाही करना चाहिए |  अतः  गोकर्ण ने अपने तपोबल से सुर्यकी गति को रोक दिया ||३९|| उन्हों ने स्तुति की--- "भगवन ! आप सारे संसार के साक्षी है , मैं आपको नमस्कार करता हूँ  | आप कृपा करके  मुझे धुन्धुकारी की मुक्तिका साधन बतायें |" गोकर्ण की यह प्रार्थना सुकर सूर्यदेव ने दुसरे ही स्पष्ट शब्दों में कहा---" श्रीमदभागवतसे मुक्ति हो सकती है ,इसलिए तुम उसका सप्ताह-पारायण करो |" सूर्यका यह धर्मंमय वचन वहां सभी ने सुना ||४०-४१||  तब सब ने यही कहाँ की प्रयत्न पूर्वक यही करो,है भी यह साधन बहुत सरल |" अतः गोकर्ण जी भी तदनुसार निश्चय करके कथा सुनाने के लिए तैयार हो गये ||४२||
देश और गाँवो से अनेको लोग कथा सुननेके लिए आये | बहुत से लंगड़े-लूले,अंधे ,बूढ़े , और मंदबुध्धि पुरुष भी अपने पपोकी निवृति के  उद्देश्य से वहां आ पहुंचे ||४३|| इस प्रकार वहां इतनी भीड़ हो गयी की उसे देखा कर देवताओ को भी आश्चर्य होता था | जब गोकर्ण जी व्यासगद्दी पर बैठकर कथा कहने लगे ,तब वह प्रेत भी वहा आ पहुंचा और इधर-उधर बैठने के लिए स्थान ढूंढने लगा  | इतनेमे ही उसकी दृष्टी एक सीधे रखे हुए सात गाँठ के बांसपर पड़ी ||४४-४५||  उसीके निचे के छिद्रमे घुसकर वह कथा सुननेके लिये बैठ गया |  वायुरूप होने के कारण वह बहार कही बैठ नहीं सकता था , इसलिए बांसमे घुस गया ||४६||

गोकर्ण जी ने वैष्णव ब्राह्मण को श्रोता बनाया  और प्रथमस्कंध से ही स्पष्ट स्वर में  कथा सुनानी आरम्भ कर दी ||४७|| सायं कालमे जब कथा को विश्राम दिया गया , तब एक बड़ी विचित्र बात हुई | वहां सभासदों के देखते-देखते उस बांसकी एक गाँठ तड-तड शब्द करती फट गयी ||४८|| इसी प्रकार दुसरे दिन सायं काल में  दूसरी गाँठ फटी और तीसरे दिन उसी समय तीसरी ||४९|| इस प्रकार सातो दिनोमे सातो गाठो किओ फोड़कर धुन्धुकारी बारहों स्कंधोके सुननेसे पवित्र होकर प्रेत योनी से मुक्त हो गया और दिव्यरूप धारण करके सबके सामने प्रगट हुआ | उसके मेघ के समान श्याम शरीर पीताम्बर और तुलसी की मालाओ से सुशोभित था तथा सिरपर मनोहर मुकुट और कानो में कमनीय कुण्डल झीलमिला रहे थे ||५०-५१|| उसने तुरंत अपने भाई गोकर्ण को प्रणाम करके कहा--- " भाई ! तुमने कृपा करके मुझे प्रेत योनिकी यातनाओ से मुक्त कर दिया ||५२|| यह प्रेतपीड़ा का नाश करनेवाली श्रीमदभागवत की कथा धन्य है तथा श्रीकृष्णचंद्रके धामकी प्राप्ति करानेवाला इसका सप्ताह-पारायण भी धन्य है ! ||५३||  जब सप्ताह-श्रवण का योग लगता है, तब सब पाप थर्रा उठते है की अब यह भागवत की कथा जल्दी ही हमारा अंत कर देगी ||५४|| जिस प्रकार आग गीली-सूखी, छोटी-बड़ी--सब तरहकी लाकदियोको जला  डालती है ,उसी प्रकार यह सप्ताह-श्रवण मन,वचन और कर्मद्वारा  किये हुए नए-पुराने, छोटे-बड़े--सभी प्रकार के पापोको भस्म कर देता है ||५५||
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 विद्वानों ने देव्तोकी सभा में कहा है की जो लोग इस भारतवर्ष में श्रीमद्भागवतकी कथा नहीं सुनते, उनका जन्म व्यर्थ ही है ||५६||  भला,मोह्पुर्वक लालन-पालन करके इस अनित्य शरीर को हृष्ट-पृष्ट और बलवान भी बना लिया तो भी श्रीमद्भावतकी कथा सुने बिना इससे क्या लाभ हुआ ? ||५७||  अश्थियाँ ही इस शरीर के आधारस्तंभ है ,नस-नाडीरूप रसियों से यह बंधा हुआ है ,उपरसे इसपर मांस और रक्त थोपकर इसे चर्म से मढ़ दिया है | इससे प्रत्येक अंग में दुर्गन्ध आती है; क्योंकि है तो यह मॉल-मुत्रका भांड ही ||५८|| वृध्धावस्था और शोकके कारण यह परिणाम में दुःखमय ही है , रोगोका तो घरही ठहरा | यह निरंतर किसी-न-किसी कामनासे पीड़ित रहता है , कभी इसकी तृप्ति नहीं होती |  इसे धारण किये रहना भी एक भार ही है ; इसके रोम-रोम में दोष भरे हुए है और नष्ट होने में क्षणबहर भी नहीं लगता ||५९||  अंतमे यदि इसे गाड़ दिया जाता है तो इसके कीड़े बन जाते है ; कोई पशु खा जाता है तो यह विष्टा हो जाता है और अग्नि में जला दिया जाता है  तो भस्म की ढेरी हो जाती है | ये तिन ही इसकी गतियाँ बतायी गयी है | इसे अश्थिर शरीरसे मनुष्य अविनाशी फल देनेवाला काम क्यों नहीं बना लेता ? ||६०|| जो अन्न प्रातः काल पकाया जात है वह सायं काल तक बिगड़ जाता है ; फिर उसीके रस से पुष्ट हुए शरीर की नित्यता कैसी ||६१||     


इस लोकमे सप्ताहश्रवण करने से भगवानकी शीघ्र ही प्राप्ति हो सकती है |  अतः सब प्रकारके दोशोकी निवृतिके  लिये एकमात्र यही साधन है ||६२||  जो लोग भगवत की कथा से वंचित है ,वे तो जलमे बुदबुदे और जिवोके मच्छरोके सामान केवल मरनेके लिये ही पैदा होते है ||६३|| भला,इसके प्रभाव से जड़ और सूखे हुए बांस की गाँठ फट सकती है ,उस भागवतकथा का श्रवण करने से चित्त की गांठो का खुल जाना कौनसी बड़ी बात है ||६४||  सप्ताह श्रवण करने से मनुष्यके ह्रदय की गाँठ खुल जाती है,उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते है और सारे कर्म क्षीण हो जाते है ||६५|| यह भागवतकथारूप तीर्थ संसारके किचाद्को धोनेमे बड़ा ही पटु है | विद्वानों का कथन है की जब यह हृदयमे स्थित हो जाता है,तब मनुष्यकी मुक्ति निश्च्चित ही समझनी चाहिये ||६६||

जिस समय धुन्धुकारी ये सब बाते कह रहा था, जिसके लिये वैकुंठवासी पार्शदोके सहित एक विमान उतरा ; उससे सब ओर मंडलाकार  प्रकश फ़ैल रहा था ||६७|| सब लोगोके सामने ही धुन्धुकारी उस विमान पर चढ़ गया | तब उस विमान पर आये हुए पार्षदोंको देखकर उनसे गोकर्ण ने यह बात कही ||६८||

गोकर्ण ने पूछा:-- भगवान् के प्रिय पार्षदों ! यहाँ तो hamare अनेको शुध्ध ह्रदय श्रोतागण है , उन सबके लिये आपलोग एक साथ बहुत से विमान क्यों नहीं लाये ? हम देखते है की यहाँ सभीने समानरूपसे कथा सुनी है , फिर फल में इस प्रकारका भेद क्यों हुआ, वह बताइये ||६९-७०||

भगवान के सेवको ने कहा:--- हे मानद ! इस फल्भेद का कारण इनके श्रवंका भेद ही है | यह ठीक है की शरवन तो सब ने समानरुपसे ही किया है,किन्तु इसके जैसा मनन नहीं किया | इसीसे एक साथ भजन करने पर भी उसके फल में भेद रहा ||७१|| इस प्रेत ने सात दिनोतक निराहार रहकर श्रवण किया था,तथा सुने हुए विषय का श्थिरचित्त से यह खूब मनन-निदिध्यासन भी कर रहा था ||७२|| जो ज्ञान दृढ नहीं होता वह व्यर्थ हो जाता है | इसीस प्रकार ध्यान न देनेसे श्रवण का ,संदेहसे  मन का ओर चित्त का इधर-उधर भटकते रहने से जपका भी कोई फल नहीं होता ||७३|| वैष्णव हीन देश,अपात्रको कराया हुआ श्राध्द का भोजन, अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान एवं आचरहिं कुल--इन सब का नाश हो जाता है ||७४||  गुरुवचनो में विश्वाश , दिनताका भाव ,मनके दोषों पर विजय ओर कथामें चित्त की एकाग्रता इत्यादि नियमोका यदि पालन किया जाय तो श्रवणका यथार्थ फल मिलता है | यदि ये श्रोता फिर से श्रीमद्भागवतकी कथा सुने तो निश्चय ही सबको वैकुण्ठकी प्राप्ति होगी ||७५-७६|| और गोकर्ण जी ! आपको तो भगवान् स्वयं आकर गोलोकधाम ले जायेंगे | यो कहकर वे सब पार्षद हरीकीर्तन करते वैकुंठलोक को चले  गए  ||७७||     


श्रावण मासमे गोकर्ण जीने फिर उसी प्रकार सप्ताह क्रमसे कथा कही और उन श्रोताओने उसे फिरसे सुना ||७८||  नारदजी ! इस कथाकी समाप्तिपर जो कुछ हुआ, वह सुनिये ||७९||  वहा भक्तो से भरे हुए विमानोके साथ भगवान् प्रगट हुए | सब ओर से खूब जय-जयकार और नमस्कार की ध्वनिया होने लगी ||८०|| भगवान् स्वयं हर्षित होकर अपने पाञ्चजन्य शंख की ध्वनी करने लगे और उन्हों ने गोकर्ण को ह्रदय से लगाकर अपने ही समान बना लिया ||८१|| उन्होंने क्षणभर में ही अन्य सब श्रोता गण को भी  मेघके समान श्यामवर्ण ,रेशमी पीताम्बरधारी तथा किरीट औ कुण्डलआदिसे  विभूषित कर दिया ||८२|| उस ग़ाव में कुत्ते और चंडाल पर्यंत जितने भी जिव थे , वे सभी गोकर्ण जीकी कृपा से विमानोपर चढ़ा लिये गये ||८३|| तथा जहाँ योगीजन जाते है वहा भगवदधाम में भेज दिए गये | इस प्रकार भक्तवत्सल श्री कृष्ण कथा श्रवण से प्रसन्न होकर गोकर्ण जी को साथ ले अपने ग्वालबालोके प्रिय गोलोकधाम में चले गये ||८४|| पूर्वकाल में जैसे अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके साथ साकेतधाम सिधारे थे , उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उन सबको योगीदुर्लभ गोलोकधामको ले गये ||८५|| जिस लोक में सूर्य,चन्द्रमा और सिध्धोकीभी गति नहीं हो सकती,उसमे वे श्रीमद्भागवत श्रवण करने से चले गये ||८६||    

नारदजी ! सप्ताहयज्ञके द्वारा कथा-श्रवण करने से जैसा उज्जवल फल संचित होता है, उसके विषय में हम आपसे क्या कहें ? अजी ! जिन्होंने अपने कर्णपुट से गोकर्णजीकी कथाके एक अक्षर का भी पान किया था ,वे फिर माता के गर्भ में नहीं आये ||८७|| जिस गतिको लोग वायु, जल या पत्ते खाकर शरीर सुखानेसे,बहुत काल तक घोर तपस्या करने से और योग अभ्यास से  भी नहीं पा सकते , उसे वे सप्ताह श्रवण से सहजमे ही  प्राप्त कर लेते है ||८८|| इस परम पवित्र इतिहास का पाठ चित्रकूटपर बिराजमान शाण्डिल्य भी ब्रह्मानन्द में मग्न होकर करते रहते है ||८९|| यह कथा बड़ी ही पवित्र है | एक बारके श्रवण से ही समस्त पाप-राशिको भस्म कर देती है | यदि इसका श्राध्ध के समय पाठ किया जाय , तो इससे पितृगण  को बड़ी तृप्ति होती है  और नित्य पाठ करनेसे मोक्ष की प्राप्ति होती है ||९०||   




Monday, 19 December 2011

गोकर्णोपाख्यान प्रारम्भ-(Gokarnopakhyan Prarambh)

गोकर्णोपाख्यान प्रारम्भ
सूतजी कहते है:--मुनिवर ! उस समय अपने भक्तो के चित्तमें  अलौकिक भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ देख भक्तवत्सल श्रीभगवान अपना धाम छोड़ कर वहा पधारे ||१|| उनके गले में वन माला शोभा पा रही थी,श्रीअंग सजलधर के समान श्यामवर्ण था,उस पर मनोहर पीताम्बर सुशोभित था, कटी प्रदेश करधानिकी लड़ियों से सुसज्जित था,सीर पर मुकुट की लटक और कानों में कुंडल की झलक देख ते ही बनती थी,||२||  वे त्रिभंग ललित भाव से खड़े चित्त को चुरा लेते थे | वक्ष:स्थल पर कौस्तुभमणि दमक रही थी,सारा श्रीअंग हरी चन्दन से चर्चित था | उस रूप शोभा का क्या कहे,उसने तो मनो करोड़ो कामदेवों की रुप्मधुरी छीन ली थी ||३||  वे परमानन्दचिन्मुर्ती मधुरातिमधुर मुरलीधर ऐसी अनुपम छवि से अपने भक्तोके निर्मल चित्तो में आविर्भूत हुए ||४|| भगवान् के नित्य लोकनिवासी लिलापरिकर उध्धावादी वहा गुप्त रूपसे उस कथा को सुननेके लिये आये हुए थे ||५|| प्रभु के प्रगट होते ही चारो ओर 'जय हो ! जय हो !'  की ध्वनी होने लगी | उस समय भक्तिरस का अद्भुत प्रवाह चला,बार-बार अबिल-गुलाल ओर पुष्पों की वर्षा तथा शंख ध्वनी होने लगी ||६|| उस सभा में जो लोग बैठे थे,उन्हें अपने देह,गेह और आत्मा की भी सुधि न रही | उनकी एसी तन्मयता देखकर नारदजी कह ने लगे--||७|| आज सप्ताह श्रवण की मैंने यह बड़ी ही अलौकिक महिमा देखि | यहाँ तो जो बड़े मुर्ख,दुष्ट और पशु-पक्षी भी है,वे सभी अत्यंत निष्पाप हो गए है ||८|| अतः  इसमें संदेह नहीं की इस कलिकाल में चित्त की शुध्धि के लिए इस भागवतकथाके समान मर्त्यलोक में पप्पुंज का नाश करने वाल कोई दूसरा  पवित्र साधन नहीं है ||९|| मुनिवर ! आपलोग बड़े कृपालु है,आपने संसारके कल्याण का  विचार करके यह बिलकुल निराला ही मार्ग निकला है | आप कृपया यह तो बताईये की इस कथारूप सप्ताहयज्ञ के द्वारा संसारमे कौन-कौन लोग पवित्र हो जाते है ||१०||
सनकादिने कहा:--  जो लोग सदा तरह-तरह के पाप क्रिया करते है,निरंतर दुराचारमें ही तत्पर रहते है और उलटे मार्गसे चलते है तथा जो क्रोधाग्नि से जलते रहनेवाले,कुटिल और कम्पारायण है,वे सभी इस कलियुग में सप्ताहयज्ञ से पवित्र हो जाते है  ||११|| जो सत्य से च्युत,माता-पिताकी निंदा करनेवाले,तृष्णा के मारे व्याकुल,आश्रमधर्म से रहित,दम्भी,दुसरो की उन्नति देख कर कुढ़नेवाले और दुसरो को दुःख देने वाले है,वे भी कलियुगमे सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१२|| जो मदिरापान,ब्रह्महत्या,सुवर्णकी चोरी,गुरुस्त्रीगमन और विश्वासघात-ये पांच महा पाप करने वाले,छल-छाद्मापारायण,क्रूर,पिशाचोके समान निर्दयी,ब्राह्मणोके  धन से पुष्ट होने वाले और व्याभिचारी है,वे भी कलियुग में सप्ताहयज्ञसे  पवित्र हो  जाते है ||१३|| जो दुष्ट आग्रहपूर्वक  सर्वदा मन,वाणी या शरीरसे पाप करते रहते है,दुसरेके धनसे ही पुष्ट होते है तथा मलिन मन और दुष्ट  हृदयवाले है,वेभी कलियुग में सप्ताहयज्ञसे  पवित्र  हो जाते है ||१४||
नारदजी ! अब हम तुम्हे इस विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनाते है.उसके सुननेसे  ही सब पाप नस्त हो जाते है ||१५|| पूर्वकाल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था | वहा सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्मो का आचरण करते हुए सत्य और सत्यकर्म में ही तत्पर रहते थे ||१६|| उस नगरमें समस्त वेदोंका विशेषज्ञ और श्रौत-स्मार्त कर्म में निपुण एक आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था ,वह साक्षात् दुसरे सूर्यके समान तेजस्वी था ||१७|| वह धनि होने पर भी भिक्षा जीवी था | उसकी प्यारी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुंदरी होने पर भी सदा अपनी बात पर अड़ जाने वाली थी ||१८|| उसे लोगो की बात करने में सुख मिलता था |  स्वभाव था क्रूर | प्रायः कुछ-न-कुछ बकवाद करती रहती थी | गृहकार्यमें निपुण थी ,कृपन थी,और थी झगडालू भी ||१९|| इस प्रकार ब्राह्मण दम्पति प्रेमसे अपने घर में रहते और vihar करते थे | उनके पास अर्थ और भोग-विलास की सामग्री बहुत थी | घर-द्वार भी सुन्दर थे परन्तु उससे उन्हें सुख नहीं था ||२०|| जब अवस्था बहुत ढल गयी,तब उन्हों ने संतान के लिए तरह-तरह के पुण्यकर्म आरम्भ किये और वे दिन दुखियो को गौ,पृथ्वी,सुवर्ण और वस्त्रादि दान करने लगे ||२१|| इस प्रकार धर्म मार्ग में उन्होंने अपना आधा धन समाप्त कर दिया ,तो भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसीका भी सुख देख ने को न मिला | इसलिए वह ब्राह्मण बहुत चिंतातुर रहने लगा ||२२|| एक दिन वह ब्राह्मण देवता बहुत  दुखी होकर घरसे निकल कर वन को चल दिया | दोपहर के समय उसको प्यास लगी,इसलिए वह एक तालाब पर आया ||२३|| संतान के अभावके दुःखने उसके शरीर को बहुत सुखा दिया था,इसलिए थक जाने के कारन जल पीकर वह वही बैठ गया | दो घडी बीतने पर वहा एक संन्यासी महात्मा आये ||२४|| जब ब्राह्मण देवता  ने देखा की वे जल पी चुके है,तब वह इनके पास गया और चरणों में नमस्कार  करने के बाद सामने खड़े होकर लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा ||२५||
संन्यासी ने पूछा:--कहो ब्राह्मणदेवता ! रोते क्यों हो ? ऐसी तुम्हे क्या भारी चिंता है ? तुम जल्द ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ ||२६||
ब्राह्मण ने कहा:--महाराज ! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोसे संचित दुःखका क्या वर्णन करू ? अब मेरे पिटर मेरे द्वारा दी गयी जलांजलिके  जलको अपनी चिंताजनित साँस से कुछ गरम करके पीते है  ||२७|| देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ प्रसन्न होकर मन से स्वीकार नहीं करते | संतान के लिए मैं इतना दुखी हो गया हूँ की मुझे सब सुना-ही-सुना दिखाई देता है | मैं प्राण त्याग ने के लिए यहाँ आया हूँ ||२८|| संतानहिन् जीवन को धिक्कार है ,संतानहिन् गृहको धिक्कार है ! संतानहीन धनको दिक्कर है और संतानहीन कुल को धिक्कार है !! ||२९||  मैं जिस गाय को पालता हूँ ,वह भी सर्वथा बाँज हो जाती है; जो पेड़ लगाता हूँ, उस पर भी फल-फुल नहीं लगते ||३०||  मेरे घर में जो फल आता है वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है | जब मैं एसा अभागा और पुत्रहिन हूँ ,तब फिर इस जीवन को ही रख कर मुझे क्या करना है ||३१|| यों कहकर वह ब्राह्मण दुःख से व्याकुल होकर  उन संन्यासी महात्मा के पास फुट-फुटकर रोने लगा | तब उन यतिवरके ह्रदयमें   बड़ी करुना उत्पन्न हुई ||३२|| वे योगनिष्ट थे; उन्हों ने उसकी ललाटकी रेखाए देखकर सारा वृतांत जान लिया और उसे विस्तारपूर्वक कहने लगे ||३३||
संन्यासी ने कहा:-- ब्राह्मणदेवता ! इस प्रजाप्राप्ति का मोह त्याग दो | कर्मकी गति प्रबल है,विवेकका आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़ दो ||३४|| विप्रवर ! सुनो; मैंने इस समय तुम्हारा प्रारब्ध देखकर निश्चय किया है की सात जन्मतक तुम्हारे कोई संतान किसी प्रकार नहीं हो सकती ||३५|| पूर्वकालमें राजा सगर को एवं अंगको संतानके कारण दुःख भोगना पड़ा था | ब्राह्मण !अब तुम कुटुम्ब की आशा छोड़ दो | संन्यास में ही सब प्रकार का सुख है ||३६||
ब्राह्मण ने कहा:--महात्माजी ! विवेकसे मेरा क्या होगा | मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिये; नहीं तो मैं आपके सामने ही शोकमुर्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ  ||३७||  जिसमे पुत्र-स्त्री अदि का सुख नहीं है,ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है | लोक मैं तो सरस पुत्र-पौत्रदिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है ||३८||

ब्राह्मण का ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधनने कहा, "विधाता के लेखको मिटाने का हठ करने से राजा चित्रकेतुको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था ||३९|| इसलिए देव जिसके उद्योग को कुचल देता है,उस पुरुष के समान तुम्हे भी पुत्रसे सुख नहीं मिल सकेगा | तुमने जो बड़ा हठ पकड़ रखा है और अर्थी के रूप में तुम मेरे सामने  उपस्थित हो; ऐसी दशामे  मैं तुमसे क्या कहूँ  ||४०||

जब महात्माजी ने देखा की वह किसी प्रकार अपना आग्रह नहीं छोड़ता,तब उन्हों ने उसे एक फल देकर कहा---"इसे तुम अपनी पत्नी को खिला देना,इससे उसके एक पुत्र होगा ||४१|| तुम्हारी स्त्री को एक साल तक सत्य,शौच,दया,दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखना चाहिए | यदि वह ऐसा करेगी तो बालक बहुत शुध्ध स्वाभाव का होगा ||४२||

यों कहकर वे योगिराज चले गए और ब्राह्मण अपने घर लौट आया | वहा आकर उसने वह फल अपनी पत्नीके हाथ में दे दिया और स्वयं कही चला गया ||४३|| उसकी स्त्री तो कुटिल स्वाभाव की थी ही ,वह रो-रोकर अपनी एक सखी से कह ने लगी मैं यह फल नहीं खाऊँगी ||४४|| फल खाने से गर्भ रहेगा और गर्भ से पेट बढ़ जाएगा | फिर कुछ खाया-पिया जाएगा नहीं इससे मेरी शक्ति  क्षीण हो जायेगी; तब बता,घरका धंधा कैसे होगा ? ||45||
और-दैववश-यदि कही गाँवमें डाकुओका आक्रमण हो गया तो गर्भिणी स्त्री कैसे भागेगी  |  यदि शुकदेवजी की तरह यह गर्भ भी  पेट मे ही रहा गया तो इसे बाहर कैसे निकला जाएगा ||४६||  और कहीं प्रसवकालके समय वह टेढ़ा हो गया तो प्राणोंसे ही हाथ धोना पड़ेगा | यों भी प्रसवके समय बड़ी भयंकर पीड़ा होती है; मैं कुमारी भला यह सब कैसे सह सकूँगी ? ||४७|| मैं जब दुर्बल पड़ जाउंगी,तब नंदरानी आकर घर का सब मॉल-मत्ता समेट ले जायेगी |  और मुझसे तो सत्य-शौच आदि नियमो का पालन होना भी कठिन ही जान पड़ता है ||४८|| जो स्त्री बच्चा जनती है,उसे उस बच्चेके लालन-पालनमें भी बड़ा कष्ट होता है | मेरे विचार से वन्ध्या या विधवा स्त्रीया ही सुखी है ||४९||

मनमे ऐसे ही तरह-तरहके कुतर्क उठ ने से उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पति ने पूछा--"फल खा लिया ?"तब उस ने कहा-- "हाँ, खा लिया" ||५०||  एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी;तब उसने अपनी बहन को सारा वृतांत सुनाकर कहा की  'मेरे मनमे इसकी बड़ी चिंता है ||५१|| मैं इस दुःख के कारण दिनोदिन दुबली हो रही हूँ | बहिन ! मैं क्यां करूँ ?' 'मेरे पेट में बच्चा है ,प्रसव होने पर वह बालक मैं तुजे दे दूंगी ||५२||  तबतक तू गर्भवती के समान घर में गुप्तरूप से सुख से रह | तू मेरे पति को कुछ धन दे देंगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे ||५३|| हम ऐसी युक्ति करेंगी की सब लोग यही कहे की 'इसका बालक छः महीने का होकर मर गया' और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालक का पालन-पोसन करती रहूंगी ||५४|| तू इस समय इसकी जांच करने के लिए यह फल गौको खिला दे |' ब्राह्मणी ने स्त्रीस्वभाववश जो-जो उसकी बहन ने कहा था ,वैसे ही सब किया ||55|| इसके पश्चात समयानुसार जब उस स्त्री को पुत्र हुआ, तब उसके पिता ने चुपचाप लाकर उसे धुन्धुलीको दे दिया ||५६|| और उसने आत्मा देव को सुख पूर्वक सुचना दे दी  की मेरे सुख पूर्वक बालक हो गया है | इस प्रकार आत्मादेव को पुत्र हुआ सुनकर सब को बड़ा आनंद हुआ ||५७||  ब्राह्मण ने उसका जातकर्म करके ब्राह्मणोंको  दान दिया औरउसके द्वारपर गाना-बजाना तथा अनेक प्रकार के मांगलिक कृत्य होने लगे ||५८|| धुन्धुली ने अपने पति से कहा ,'मेरे स्तनों में दूध ही नहीं है,फिर गौ आदि किसी अन्य जिव के दूध से मैं इस बालक का किस प्रकार पालन करुँगी ?' ||५९|| मेरी बहिन को अभी बालक हुआ था,वह मर गया है;उसे बुलाकर अपने यहाँ रख ले तो वह आपके इस बच्चे का पालन-पोषण कर लेंगी ||६०|| तब पुत्र की रक्षा के लिए आत्मदेव ने वैसा ही किया तथा माता-धुन्धुली ने उस बालक का नाम धुन्धुकारी रखा ||६१||

इसके बाद तिन महीने बीतने पर उस गौके भी एक मनुष्याकार बच्चा हुआ | वह सर्वांग सुन्दर ,दिव्य,निर्मल तथा सुवर्ण सी कान्तिवाल सा था ||६२||  उसे देखकर ब्राह्मणदेवता को बड़ा आनंद हुआ और स्वयं ही उसके सारेस्कार किये | इस समाचार से और सब लोगो को भी बड़ा ही आश्चर्य हुआ और वे बालक को देखने को आये ||६३|| तथा आपस मैं कहने लगे ,'देखो, भाई ! अब आत्मदेव का कैसा भाग्य उदय हुआ है  | कैसे आश्चर्य की बात है की गौके भी ऐसा दिव्य रूप बालक उत्पन्न हुआ है' ||६४||  दैवयोगसे इस गुप्त रह्स्यका किसी को  बता नहीं लगा | आत्मदेव ने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम "गोकर्ण" रखा ||६५||


कुछ काल बीतने पर वे दोनों बालक जवान हो गए | उनमे गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ,किन्तु धुन्धुकारी बड़ा ही बड़ा ही दुष्ट निकला ||६६||  स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारो का उसमे नाम भी न था और न खानपान का ही कोई परहेज था |  क्रोध उसमे बहुत बढ़ा चढ़ा था | व बुरी-बुरी वस्तुओका संग्रह किया करता था  | मुर्दे के हाथ से छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था ||६७|| दुसरोकी चोरी करना और सब लोगो से द्वेष बढ़ाना उसका स्वाभाव बन गया था | छिपे-छिपे वह दुसरो के घरो में आग लगा देता था | दूसरो के बालकोको खेलाने के लिए गोदमें लेता और उन्हें चाट कुए में  डाल देता ||६८||  हिंसाका उसे व्यसन सा हो गया था | हर समय वह अस्त्र-सस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दिन-दुखियो को व्यर्थ तंग करता | चंडालोसे उसका विशेष प्रेम था ;bas,हाथमे फंदा लिए कुत्तो की टोली के साथ शिकार्की टोहमें घूमता रहता ||६९||  वेश्याओके जालमें फसकर अपने पिता की सारी सम्पत्ति नष्ट कर दी | एक दिन माता-पिता को मार-पिट कर घर के सब बर्तन उठा  लेगया ||७०|| 

इस प्रकार जब सारी संपत्ति स्वाहा हो गयी,तब उसका पिता फुट-फुटकर रोने लगा और बोला--"इससे तो इसकी माका बाँझ रहना ही अच्छा था ;कुपुत्र तो बड़ा ही दुखदायी होता है ||७१|| अब मैं कहाँ रहूँ ? कहाँ जाऊं ? मेरे इस संकट को कौन काटेगा ? हाय ! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है,इस दुःख के कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ ने पड़ेंगे ||७२|| उसी समय परमज्ञानी गोकर्ण जो वहा आये और उन्हों ने पिता को वैराग्यका उपदेश करते हुए बहुत समझाया ||७३|| वे बोले,"पिताजी ! यह संसार असार है| यह अत्यंत दुःख रूप और मोह में डालने वाल है | पुत्र किसका ? धन किसका ? स्नेहवान पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है  ||७४|| सुख न तो इन्द्र को है और न चक्रवर्ती राजा को ही;सुख है तो विरक्त,एकांतजीवी मुनि को ||७५||  'यह मेरा पुत्र है' इस अज्ञान को छोड़ दीजिये |  मोह से नरक की प्राप्ति होती है | यह शरीर तो नष्ट होगा ही | इसलिए सबकुछ छोड़कर वन में चले जाइये ||७६||

गोकर्ण के वचन सुनकर आत्मदेव वनमें जाने के लिए तैयार होया गया और उनसे कहने लगा, "बेटा ! वन में रहकर मुझे क्या करना चाहिए, यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो  ||७७||  मैं बड़ा मुर्ख हूँ,अबतक कर्मवश स्नेह-पाशमे बंधा हुआ अपंग की भाती इस घररूप अँधेरे कुएमे ही पड़ा रहा हूँ | तुम बड़े दयालु हो, 'इससे मेरा उद्धार करो ' ||७८||
गोकर्ण ने कहा:--पिताजी ! यह शरीर हड्डी,मांस और रुधिर का पिण्ड है; इसे आप 'मैं' मानना छोड़  दे और  स्त्री-पुत्रादि को कभी अपना न माने |  इस संसार को रात-दिन क्षणभंगुर देखे,इसकी किसी भी वास्तु को स्थायी समझकर उसमे राग न करे | बस, एक मात्र वैराग्य-रसके रसिक होकर भगवानकी भक्तिमें लगे रहे ||७९||  भगवद भजन  ही सबसे बड़ा धर्मं है,निरंतर उसीका आश्रय लिए रहे |  अन्य सब प्रकार के लौकिक धरनों से मुख मोड़ ले | सदा साधु जनों की सेवा करे | भोगोकी लालसाओ को पास न भटक ने दे तथा जल्दी-से-जल्दी दुसरोके गुण-दोषोंका विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान की कथाओके रस का ही पान करे  ||८०||

इस प्रकार पुत्र की वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेव ने घर छोड़ दिया और वन की यात्रा की | यद्यपि उसकी आयु उस समय साठ वर्षकी हो चुकी थी,फिर भी बुध्धि में पूरी दृढ़ता थी | वह रात-दिन भगवान की सेवा-पूजा करने से और नियमपूर्वक भगवतके दशमस्कंधका पाठकरने से  उसने भगवान श्रीकृष्णचन्द्रको प्राप्त कर लिया ||८१||