Saturday, 3 March 2012

महर्षि व्यासका असंतोष-Maharshi Vyaaska Asantosh

चौथा अध्याय 
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महर्षि व्यासका असंतोष
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व्यास जी कहते है— उस दीर्घकालीन सत्रमें सम्मिलित हुए मुनियोमे विद्या-वयोवृध्ध कुलपति ऋग्वेदी शौनकजीने सुतजीकी पूर्वोक्त बात सुनकर उनकी प्रशंसा की और कहा ।।१।।
     शौनकजी बोले—सूतजी ! आप वक्ताओमे श्रेष्ट है तथा बड़े भाग्यशाली है । जो कथा भगवान् श्रीशुकदेवजीने कही थी ,वाही भगवानकी पुण्यमयी कथा कृपा करके आप हमें सुनाइये ।।२।। वह कथा किस  युगमें,किस स्थान पर और किस कारण से हुई थी ? मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायनने किसकी प्रेरणना से इस परमहंसो की संहिता का निर्माण किया था ? ।।३।। उनके पुत्र शुकदेवजी बड़े योगी,समदर्शी,भेदभाव-रहित,संसार-निंद्रासे जगे एवं निरंतर एकमात्र परमात्मामे ही स्थित रहते है । वे छिपे रहनेके कारण मूढ़-से प्रतीत होते है ।।४।। व्यासजी जब संन्यासके लिये वनकी ओर जाते हुए अपने पुत्रका पीछा कर रहे थे ,उस समय जलमे स्नान करनेवाली स्त्रियोने नंगे शुकदेवको देखकर तो वस्त्र धारण नहीं किया ,परन्तु वस्त्र पहने हुए व्यासजी को देखकर लज्जासे कपडे पहन लिये थे ।  इस आश्चर्यको देखकर जब व्यासजीने उन स्त्रियोंसे इसका कारण पूछा , तब उन्होंने उत्तर दिया की ' आपकी दृष्टिमें तो अभी स्त्री-पुरुषका भेद बना हुआ है, परन्तु आपके पुत्रकी शुध्ध दृष्टिमे यह भेद नहीं है' ।।५।। कुरुजांगल देशमे पहुचकर हस्तिनापुर में वे पागल, गूंगे
तथा जड़ के समान विचरते होंगे । नगरवासियों ने उन्हें कैसे पहचाना ? ।।६।। पांडव नंदन राजर्षि परीक्षित का  इन मौनी शुकदेवजीके साथ संवाद कैसे हुआ, जिसमे यह भगवत संहिता कही गयी ? ।।७।। महाभाग श्री शुकदेवजी तो गृहस्थोके घरोको तीर्थ स्वरुप बना देनेके लिए उतनी ही देर उनके दरवाजे पर रहते है, जितनी देरमें एक गाय दुही जाती है ।।८।। सूतजी ! हमने सुना है  की अभिमन्यु नन्दन  परीक्षित भगवान् के बड़े प्रेमी भक्त थे । उनके अत्यंत आश्चर्यमय जन्म और कर्मोका भी वर्णन कीजिये ।।९।। वे तो पाण्डववंशके गौरव बढ़ानेवाले सम्राट थे । वे भला, किस कारणसे साम्राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके गंगा तट पर मृत्यु पर्यंत अनशनका व्रत लेकर बैठे थे ? ।।१०।। शत्रुगण अपने भलेके लिए बहुत-सा धन लाकर उनके चरण रखने की चौकी को  नमस्कार करते थे । वे एक वीर युवक थे । उन्होंने उस दुस्त्यज लक्ष्मी को , अपने प्राणों के साथ भला क्यों त्यागने देने की इच्छा की ।।११।। जिन लोगोका जीवन भगवान् के आश्रित है, वे तो संसारके परम कल्याण, अभ्युदय और समृध्धि के लिये ही जीवन धारण करते है । उसमे उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता । उनका शरीर तो दुसरोके हितके लिये था, उन्होंने विरक्त होकर उसका परित्याग क्यों किया ?।।१२।। वेदवाणी को छोड़कर अन्य समस्त शास्त्रोके आप पारदर्शी विद्वान है । सूतजी ! इसलिए जो कुछ हमने आपसे पूछा है, वह सब कृपा करके हमें कहिये ।।१३।।
सूतजीने  कहा—इस वर्तमान चतुर्युगीके तीसरे युग द्वापरमें महर्षि पराशरके द्वारा वसु-कन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान् के कलावतार योगिराज व्यासजिका जन्म हुआ ।।१४।। एक दिन वे सरस्वती के पवित्र जलमें स्नानादि करके एकांत पवित्र स्थान पर बैठे हुए थे ।१५।। महर्षि भुत और भविष्य को जानते थे । उनकी दृष्टि अचुकथी । उन्होंने देखा की  जिसको लोग जान नहीं पाते, ऐसे समय के फेरसे प्रत्येक युग्मे धर्मं संकरता और उसके प्रभावसे भौतिक वस्तुओकी भी शक्तिका ह्रास होता रहता है । संसारके लोग श्रध्धा हिन् और शक्ति रहित हो जाते है । उनकी बुध्धि कर्तव्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाती और आयुभी कम हो जाती है । लोगोकी इस भाग्यहीनता को देखकर उन मुनीश्वरने अपनी दिव्य दृष्टि से समस्त वर्णों और आश्रमों का हित kaise हो, इस पर विचार किया ।।१६-१८।। उन्होंने सोचा की वेदोक्त चातुर्होत्र * कर्म लोगोका हृदय शुध्ध करने वाला है । इस  दृष्टि से यज्ञोका  विस्तार करनेके लिये उन्होंने एक ही वेद के चार भाग कर दिये ।।१९।। व्यास जी के द्वारा ऋक, यजु, साम, और अथर्व —इन चार वेदोका उद्धार हुआ । इतिहास और पुराणोको पाँचवा वेद कहा जाता है ।।२०।। उनमेसे ऋकवेद पैल, साम-गान के विद्वान जैमिनी एवं यजुर्वेद्के एकमात्र स्त्रातक वैशम्पायन हुए ।।२१।। अथर्ववेदमें प्रवीण हुए दारुणनंदन सुमन्तु मुनि । इतिहास और पुराणों के स्त्रातक मेरे पिता रोमहर्षण थे ।।२२।।  इन पूर्वोक्त ऋषियोंने अपनी-अपनी शाखाको और भी अनेक भागोंमे विभक्त कर दिया । इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य और उनके शिष्योंद्वारा वेदोकी बहुतसी शाखाए बन गयी ।।२३।। कम समझवाले पुरुषोपर कृपा करके भगवान् वेदव्यासने इसलिये ऐसा विभाग कर दिया की जिन लोगोको स्मरणशक्ति नहीं है, वे भी वेदोको धारण कर सके ।।२४।। स्त्री,शुद्र और पतित द्विजाति—तीनो  ही वेद-श्रवणके अधिकारी नहीं है । इसलिये वे कल्याणकारी शास्त्रोक्त कर्मोके आचरणमें भूल  कर बैठते है ।  अब इसके द्वारा उनका भी कल्याण हो जाय, यह सोचकर महामुनि व्यासजी ने बड़ी कृपा करके महाभारत इतिहास की रचना की ।।२५।। शौनकादिक ऋषियों ! यद्यपि व्यासजी इस प्रकार अपनी पूरी शक्तिसे सदा-सर्वदा प्राणियों के कल्यान्मे ही लगे रहे, तथापि उनके हृदय को संतोष  नहीं हुआ ।।२६।। उनका मन कुछ खिन्न-सा हो गया । सरस्वती नदीके पवित्र तटपर एकांतमें बैठकर धर्मवेत्ता व्यासजी मन-ही-मन विचार करते हुए इस प्रकार कहने लगे —।।२७।। 'मैंने निष्कपट भावसे ब्रह्मचर्यादी व्रतोका पालन करते हुए वेद, गुरुजन और अग्नियोका सन्मान किया है और उनकी आज्ञाका पालन किया है ।।२८।। महाभारतकी रचनाके बहाने मैंने वेदके अर्थको खोल दिया है—जिसमे स्त्री, शुद्र आदि भी अपने-अपने धर्मं-कर्मका ज्ञान प्राप्त कर लेते है ।।२९।। यद्यपि मैं ब्रह्मतेजसे संपन्न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्ण सा जान पड़ता है ।।३०।। अवश्य ही अबतक मैंने भगवान् को प्राप्त करने वाले धर्मोका प्रायः निरूपण नहीं किया है । वे ही धर्मं परमहंसो को प्रिय है और वे ही भगवान् को प्रिय है (हो-न-हो मेरी अपूर्णता का यही कारण है)' ।।३१।। श्रीकृष्णद्वैपायमान  व्यास इस प्रकार अपनेको अपूर्ण-सा मानकर जब खिन्न हो रहे थे, उसी समय पूर्वोक्त आश्रमपर देवर्षि नारदजी  आ पहुचे।।३२।। उन्हें आया देख व्यासजी तुरंत खड़े हो गये । उन्होंने देवताओं के द्वारा सम्मानित देवर्षि नारदजी विधिपूर्वक पूजा की ।।३३।।
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* होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा — ये चार होता है । इनके द्वारा सम्पादित होनेवाले अग्निष्टोमादी यज्ञको चातुर्होत्र कहते है ।  
             



 

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