गोकर्णोपाख्यान प्रारम्भ
सूतजी कहते है:--मुनिवर ! उस समय अपने भक्तो के चित्तमें अलौकिक भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ देख भक्तवत्सल श्रीभगवान अपना धाम छोड़ कर वहा पधारे ||१|| उनके गले में वन माला शोभा पा रही थी,श्रीअंग सजलधर के समान श्यामवर्ण था,उस पर मनोहर पीताम्बर सुशोभित था, कटी प्रदेश करधानिकी लड़ियों से सुसज्जित था,सीर पर मुकुट की लटक और कानों में कुंडल की झलक देख ते ही बनती थी,||२|| वे त्रिभंग ललित भाव से खड़े चित्त को चुरा लेते थे | वक्ष:स्थल पर कौस्तुभमणि दमक रही थी,सारा श्रीअंग हरी चन्दन से चर्चित था | उस रूप शोभा का क्या कहे,उसने तो मनो करोड़ो कामदेवों की रुप्मधुरी छीन ली थी ||३|| वे परमानन्दचिन्मुर्ती मधुरातिमधुर मुरलीधर ऐसी अनुपम छवि से अपने भक्तोके निर्मल चित्तो में आविर्भूत हुए ||४|| भगवान् के नित्य लोकनिवासी लिलापरिकर उध्धावादी वहा गुप्त रूपसे उस कथा को सुननेके लिये आये हुए थे ||५|| प्रभु के प्रगट होते ही चारो ओर 'जय हो ! जय हो !' की ध्वनी होने लगी | उस समय भक्तिरस का अद्भुत प्रवाह चला,बार-बार अबिल-गुलाल ओर पुष्पों की वर्षा तथा शंख ध्वनी होने लगी ||६|| उस सभा में जो लोग बैठे थे,उन्हें अपने देह,गेह और आत्मा की भी सुधि न रही | उनकी एसी तन्मयता देखकर नारदजी कह ने लगे--||७|| आज सप्ताह श्रवण की मैंने यह बड़ी ही अलौकिक महिमा देखि | यहाँ तो जो बड़े मुर्ख,दुष्ट और पशु-पक्षी भी है,वे सभी अत्यंत निष्पाप हो गए है ||८|| अतः इसमें संदेह नहीं की इस कलिकाल में चित्त की शुध्धि के लिए इस भागवतकथाके समान मर्त्यलोक में पप्पुंज का नाश करने वाल कोई दूसरा पवित्र साधन नहीं है ||९|| मुनिवर ! आपलोग बड़े कृपालु है,आपने संसारके कल्याण का विचार करके यह बिलकुल निराला ही मार्ग निकला है | आप कृपया यह तो बताईये की इस कथारूप सप्ताहयज्ञ के द्वारा संसारमे कौन-कौन लोग पवित्र हो जाते है ||१०||
सनकादिने कहा:-- जो लोग सदा तरह-तरह के पाप क्रिया करते है,निरंतर दुराचारमें ही तत्पर रहते है और उलटे मार्गसे चलते है तथा जो क्रोधाग्नि से जलते रहनेवाले,कुटिल और कम्पारायण है,वे सभी इस कलियुग में सप्ताहयज्ञ से पवित्र हो जाते है ||११|| जो सत्य से च्युत,माता-पिताकी निंदा करनेवाले,तृष्णा के मारे व्याकुल,आश्रमधर्म से रहित,दम्भी,दुसरो की उन्नति देख कर कुढ़नेवाले और दुसरो को दुःख देने वाले है,वे भी कलियुगमे सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१२|| जो मदिरापान,ब्रह्महत्या,सुवर्णकी चोरी,गुरुस्त्रीगमन और विश्वासघात-ये पांच महा पाप करने वाले,छल-छाद्मापारायण,क्रूर,पिशाचोके समान निर्दयी,ब्राह्मणोके धन से पुष्ट होने वाले और व्याभिचारी है,वे भी कलियुग में सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१३|| जो दुष्ट आग्रहपूर्वक सर्वदा मन,वाणी या शरीरसे पाप करते रहते है,दुसरेके धनसे ही पुष्ट होते है तथा मलिन मन और दुष्ट हृदयवाले है,वेभी कलियुग में सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१४||
नारदजी ! अब हम तुम्हे इस विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनाते है.उसके सुननेसे ही सब पाप नस्त हो जाते है ||१५|| पूर्वकाल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था | वहा सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्मो का आचरण करते हुए सत्य और सत्यकर्म में ही तत्पर रहते थे ||१६|| उस नगरमें समस्त वेदोंका विशेषज्ञ और श्रौत-स्मार्त कर्म में निपुण एक आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था ,वह साक्षात् दुसरे सूर्यके समान तेजस्वी था ||१७|| वह धनि होने पर भी भिक्षा जीवी था | उसकी प्यारी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुंदरी होने पर भी सदा अपनी बात पर अड़ जाने वाली थी ||१८|| उसे लोगो की बात करने में सुख मिलता था | स्वभाव था क्रूर | प्रायः कुछ-न-कुछ बकवाद करती रहती थी | गृहकार्यमें निपुण थी ,कृपन थी,और थी झगडालू भी ||१९|| इस प्रकार ब्राह्मण दम्पति प्रेमसे अपने घर में रहते और vihar करते थे | उनके पास अर्थ और भोग-विलास की सामग्री बहुत थी | घर-द्वार भी सुन्दर थे परन्तु उससे उन्हें सुख नहीं था ||२०|| जब अवस्था बहुत ढल गयी,तब उन्हों ने संतान के लिए तरह-तरह के पुण्यकर्म आरम्भ किये और वे दिन दुखियो को गौ,पृथ्वी,सुवर्ण और वस्त्रादि दान करने लगे ||२१|| इस प्रकार धर्म मार्ग में उन्होंने अपना आधा धन समाप्त कर दिया ,तो भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसीका भी सुख देख ने को न मिला | इसलिए वह ब्राह्मण बहुत चिंतातुर रहने लगा ||२२|| एक दिन वह ब्राह्मण देवता बहुत दुखी होकर घरसे निकल कर वन को चल दिया | दोपहर के समय उसको प्यास लगी,इसलिए वह एक तालाब पर आया ||२३|| संतान के अभावके दुःखने उसके शरीर को बहुत सुखा दिया था,इसलिए थक जाने के कारन जल पीकर वह वही बैठ गया | दो घडी बीतने पर वहा एक संन्यासी महात्मा आये ||२४|| जब ब्राह्मण देवता ने देखा की वे जल पी चुके है,तब वह इनके पास गया और चरणों में नमस्कार करने के बाद सामने खड़े होकर लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा ||२५||
संन्यासी ने पूछा:--कहो ब्राह्मणदेवता ! रोते क्यों हो ? ऐसी तुम्हे क्या भारी चिंता है ? तुम जल्द ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ ||२६||
ब्राह्मण ने कहा:--महाराज ! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोसे संचित दुःखका क्या वर्णन करू ? अब मेरे पिटर मेरे द्वारा दी गयी जलांजलिके जलको अपनी चिंताजनित साँस से कुछ गरम करके पीते है ||२७|| देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ प्रसन्न होकर मन से स्वीकार नहीं करते | संतान के लिए मैं इतना दुखी हो गया हूँ की मुझे सब सुना-ही-सुना दिखाई देता है | मैं प्राण त्याग ने के लिए यहाँ आया हूँ ||२८|| संतानहिन् जीवन को धिक्कार है ,संतानहिन् गृहको धिक्कार है ! संतानहीन धनको दिक्कर है और संतानहीन कुल को धिक्कार है !! ||२९|| मैं जिस गाय को पालता हूँ ,वह भी सर्वथा बाँज हो जाती है; जो पेड़ लगाता हूँ, उस पर भी फल-फुल नहीं लगते ||३०|| मेरे घर में जो फल आता है वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है | जब मैं एसा अभागा और पुत्रहिन हूँ ,तब फिर इस जीवन को ही रख कर मुझे क्या करना है ||३१|| यों कहकर वह ब्राह्मण दुःख से व्याकुल होकर उन संन्यासी महात्मा के पास फुट-फुटकर रोने लगा | तब उन यतिवरके ह्रदयमें बड़ी करुना उत्पन्न हुई ||३२|| वे योगनिष्ट थे; उन्हों ने उसकी ललाटकी रेखाए देखकर सारा वृतांत जान लिया और उसे विस्तारपूर्वक कहने लगे ||३३||
संन्यासी ने कहा:-- ब्राह्मणदेवता ! इस प्रजाप्राप्ति का मोह त्याग दो | कर्मकी गति प्रबल है,विवेकका आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़ दो ||३४|| विप्रवर ! सुनो; मैंने इस समय तुम्हारा प्रारब्ध देखकर निश्चय किया है की सात जन्मतक तुम्हारे कोई संतान किसी प्रकार नहीं हो सकती ||३५|| पूर्वकालमें राजा सगर को एवं अंगको संतानके कारण दुःख भोगना पड़ा था | ब्राह्मण !अब तुम कुटुम्ब की आशा छोड़ दो | संन्यास में ही सब प्रकार का सुख है ||३६||
ब्राह्मण ने कहा:--महात्माजी ! विवेकसे मेरा क्या होगा | मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिये; नहीं तो मैं आपके सामने ही शोकमुर्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ ||३७|| जिसमे पुत्र-स्त्री अदि का सुख नहीं है,ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है | लोक मैं तो सरस पुत्र-पौत्रदिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है ||३८||
ब्राह्मण का ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधनने कहा, "विधाता के लेखको मिटाने का हठ करने से राजा चित्रकेतुको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था ||३९|| इसलिए देव जिसके उद्योग को कुचल देता है,उस पुरुष के समान तुम्हे भी पुत्रसे सुख नहीं मिल सकेगा | तुमने जो बड़ा हठ पकड़ रखा है और अर्थी के रूप में तुम मेरे सामने उपस्थित हो; ऐसी दशामे मैं तुमसे क्या कहूँ ||४०||
जब महात्माजी ने देखा की वह किसी प्रकार अपना आग्रह नहीं छोड़ता,तब उन्हों ने उसे एक फल देकर कहा---"इसे तुम अपनी पत्नी को खिला देना,इससे उसके एक पुत्र होगा ||४१|| तुम्हारी स्त्री को एक साल तक सत्य,शौच,दया,दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखना चाहिए | यदि वह ऐसा करेगी तो बालक बहुत शुध्ध स्वाभाव का होगा ||४२||
यों कहकर वे योगिराज चले गए और ब्राह्मण अपने घर लौट आया | वहा आकर उसने वह फल अपनी पत्नीके हाथ में दे दिया और स्वयं कही चला गया ||४३|| उसकी स्त्री तो कुटिल स्वाभाव की थी ही ,वह रो-रोकर अपनी एक सखी से कह ने लगी मैं यह फल नहीं खाऊँगी ||४४|| फल खाने से गर्भ रहेगा और गर्भ से पेट बढ़ जाएगा | फिर कुछ खाया-पिया जाएगा नहीं इससे मेरी शक्ति क्षीण हो जायेगी; तब बता,घरका धंधा कैसे होगा ? ||45||
और-दैववश-यदि कही गाँवमें डाकुओका आक्रमण हो गया तो गर्भिणी स्त्री कैसे भागेगी | यदि शुकदेवजी की तरह यह गर्भ भी पेट मे ही रहा गया तो इसे बाहर कैसे निकला जाएगा ||४६|| और कहीं प्रसवकालके समय वह टेढ़ा हो गया तो प्राणोंसे ही हाथ धोना पड़ेगा | यों भी प्रसवके समय बड़ी भयंकर पीड़ा होती है; मैं कुमारी भला यह सब कैसे सह सकूँगी ? ||४७|| मैं जब दुर्बल पड़ जाउंगी,तब नंदरानी आकर घर का सब मॉल-मत्ता समेट ले जायेगी | और मुझसे तो सत्य-शौच आदि नियमो का पालन होना भी कठिन ही जान पड़ता है ||४८|| जो स्त्री बच्चा जनती है,उसे उस बच्चेके लालन-पालनमें भी बड़ा कष्ट होता है | मेरे विचार से वन्ध्या या विधवा स्त्रीया ही सुखी है ||४९||
मनमे ऐसे ही तरह-तरहके कुतर्क उठ ने से उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पति ने पूछा--"फल खा लिया ?"तब उस ने कहा-- "हाँ, खा लिया" ||५०|| एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी;तब उसने अपनी बहन को सारा वृतांत सुनाकर कहा की 'मेरे मनमे इसकी बड़ी चिंता है ||५१|| मैं इस दुःख के कारण दिनोदिन दुबली हो रही हूँ | बहिन ! मैं क्यां करूँ ?' 'मेरे पेट में बच्चा है ,प्रसव होने पर वह बालक मैं तुजे दे दूंगी ||५२|| तबतक तू गर्भवती के समान घर में गुप्तरूप से सुख से रह | तू मेरे पति को कुछ धन दे देंगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे ||५३|| हम ऐसी युक्ति करेंगी की सब लोग यही कहे की 'इसका बालक छः महीने का होकर मर गया' और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालक का पालन-पोसन करती रहूंगी ||५४|| तू इस समय इसकी जांच करने के लिए यह फल गौको खिला दे |' ब्राह्मणी ने स्त्रीस्वभाववश जो-जो उसकी बहन ने कहा था ,वैसे ही सब किया ||55|| इसके पश्चात समयानुसार जब उस स्त्री को पुत्र हुआ, तब उसके पिता ने चुपचाप लाकर उसे धुन्धुलीको दे दिया ||५६|| और उसने आत्मा देव को सुख पूर्वक सुचना दे दी की मेरे सुख पूर्वक बालक हो गया है | इस प्रकार आत्मादेव को पुत्र हुआ सुनकर सब को बड़ा आनंद हुआ ||५७|| ब्राह्मण ने उसका जातकर्म करके ब्राह्मणोंको दान दिया औरउसके द्वारपर गाना-बजाना तथा अनेक प्रकार के मांगलिक कृत्य होने लगे ||५८|| धुन्धुली ने अपने पति से कहा ,'मेरे स्तनों में दूध ही नहीं है,फिर गौ आदि किसी अन्य जिव के दूध से मैं इस बालक का किस प्रकार पालन करुँगी ?' ||५९|| मेरी बहिन को अभी बालक हुआ था,वह मर गया है;उसे बुलाकर अपने यहाँ रख ले तो वह आपके इस बच्चे का पालन-पोषण कर लेंगी ||६०|| तब पुत्र की रक्षा के लिए आत्मदेव ने वैसा ही किया तथा माता-धुन्धुली ने उस बालक का नाम धुन्धुकारी रखा ||६१||
इसके बाद तिन महीने बीतने पर उस गौके भी एक मनुष्याकार बच्चा हुआ | वह सर्वांग सुन्दर ,दिव्य,निर्मल तथा सुवर्ण सी कान्तिवाल सा था ||६२|| उसे देखकर ब्राह्मणदेवता को बड़ा आनंद हुआ और स्वयं ही उसके सारेस्कार किये | इस समाचार से और सब लोगो को भी बड़ा ही आश्चर्य हुआ और वे बालक को देखने को आये ||६३|| तथा आपस मैं कहने लगे ,'देखो, भाई ! अब आत्मदेव का कैसा भाग्य उदय हुआ है | कैसे आश्चर्य की बात है की गौके भी ऐसा दिव्य रूप बालक उत्पन्न हुआ है' ||६४|| दैवयोगसे इस गुप्त रह्स्यका किसी को बता नहीं लगा | आत्मदेव ने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम "गोकर्ण" रखा ||६५||
कुछ काल बीतने पर वे दोनों बालक जवान हो गए | उनमे गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ,किन्तु धुन्धुकारी बड़ा ही बड़ा ही दुष्ट निकला ||६६|| स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारो का उसमे नाम भी न था और न खानपान का ही कोई परहेज था | क्रोध उसमे बहुत बढ़ा चढ़ा था | व बुरी-बुरी वस्तुओका संग्रह किया करता था | मुर्दे के हाथ से छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था ||६७|| दुसरोकी चोरी करना और सब लोगो से द्वेष बढ़ाना उसका स्वाभाव बन गया था | छिपे-छिपे वह दुसरो के घरो में आग लगा देता था | दूसरो के बालकोको खेलाने के लिए गोदमें लेता और उन्हें चाट कुए में डाल देता ||६८|| हिंसाका उसे व्यसन सा हो गया था | हर समय वह अस्त्र-सस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दिन-दुखियो को व्यर्थ तंग करता | चंडालोसे उसका विशेष प्रेम था ;bas,हाथमे फंदा लिए कुत्तो की टोली के साथ शिकार्की टोहमें घूमता रहता ||६९|| वेश्याओके जालमें फसकर अपने पिता की सारी सम्पत्ति नष्ट कर दी | एक दिन माता-पिता को मार-पिट कर घर के सब बर्तन उठा लेगया ||७०||
इस प्रकार जब सारी संपत्ति स्वाहा हो गयी,तब उसका पिता फुट-फुटकर रोने लगा और बोला--"इससे तो इसकी माका बाँझ रहना ही अच्छा था ;कुपुत्र तो बड़ा ही दुखदायी होता है ||७१|| अब मैं कहाँ रहूँ ? कहाँ जाऊं ? मेरे इस संकट को कौन काटेगा ? हाय ! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है,इस दुःख के कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ ने पड़ेंगे ||७२|| उसी समय परमज्ञानी गोकर्ण जो वहा आये और उन्हों ने पिता को वैराग्यका उपदेश करते हुए बहुत समझाया ||७३|| वे बोले,"पिताजी ! यह संसार असार है| यह अत्यंत दुःख रूप और मोह में डालने वाल है | पुत्र किसका ? धन किसका ? स्नेहवान पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है ||७४|| सुख न तो इन्द्र को है और न चक्रवर्ती राजा को ही;सुख है तो विरक्त,एकांतजीवी मुनि को ||७५|| 'यह मेरा पुत्र है' इस अज्ञान को छोड़ दीजिये | मोह से नरक की प्राप्ति होती है | यह शरीर तो नष्ट होगा ही | इसलिए सबकुछ छोड़कर वन में चले जाइये ||७६||
गोकर्ण के वचन सुनकर आत्मदेव वनमें जाने के लिए तैयार होया गया और उनसे कहने लगा, "बेटा ! वन में रहकर मुझे क्या करना चाहिए, यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो ||७७|| मैं बड़ा मुर्ख हूँ,अबतक कर्मवश स्नेह-पाशमे बंधा हुआ अपंग की भाती इस घररूप अँधेरे कुएमे ही पड़ा रहा हूँ | तुम बड़े दयालु हो, 'इससे मेरा उद्धार करो ' ||७८||
गोकर्ण ने कहा:--पिताजी ! यह शरीर हड्डी,मांस और रुधिर का पिण्ड है; इसे आप 'मैं' मानना छोड़ दे और स्त्री-पुत्रादि को कभी अपना न माने | इस संसार को रात-दिन क्षणभंगुर देखे,इसकी किसी भी वास्तु को स्थायी समझकर उसमे राग न करे | बस, एक मात्र वैराग्य-रसके रसिक होकर भगवानकी भक्तिमें लगे रहे ||७९|| भगवद भजन ही सबसे बड़ा धर्मं है,निरंतर उसीका आश्रय लिए रहे | अन्य सब प्रकार के लौकिक धरनों से मुख मोड़ ले | सदा साधु जनों की सेवा करे | भोगोकी लालसाओ को पास न भटक ने दे तथा जल्दी-से-जल्दी दुसरोके गुण-दोषोंका विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान की कथाओके रस का ही पान करे ||८०||
इस प्रकार पुत्र की वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेव ने घर छोड़ दिया और वन की यात्रा की | यद्यपि उसकी आयु उस समय साठ वर्षकी हो चुकी थी,फिर भी बुध्धि में पूरी दृढ़ता थी | वह रात-दिन भगवान की सेवा-पूजा करने से और नियमपूर्वक भगवतके दशमस्कंधका पाठकरने से उसने भगवान श्रीकृष्णचन्द्रको प्राप्त कर लिया ||८१||
सनकादिने कहा:-- जो लोग सदा तरह-तरह के पाप क्रिया करते है,निरंतर दुराचारमें ही तत्पर रहते है और उलटे मार्गसे चलते है तथा जो क्रोधाग्नि से जलते रहनेवाले,कुटिल और कम्पारायण है,वे सभी इस कलियुग में सप्ताहयज्ञ से पवित्र हो जाते है ||११|| जो सत्य से च्युत,माता-पिताकी निंदा करनेवाले,तृष्णा के मारे व्याकुल,आश्रमधर्म से रहित,दम्भी,दुसरो की उन्नति देख कर कुढ़नेवाले और दुसरो को दुःख देने वाले है,वे भी कलियुगमे सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१२|| जो मदिरापान,ब्रह्महत्या,सुवर्णकी चोरी,गुरुस्त्रीगमन और विश्वासघात-ये पांच महा पाप करने वाले,छल-छाद्मापारायण,क्रूर,पिशाचोके समान निर्दयी,ब्राह्मणोके धन से पुष्ट होने वाले और व्याभिचारी है,वे भी कलियुग में सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१३|| जो दुष्ट आग्रहपूर्वक सर्वदा मन,वाणी या शरीरसे पाप करते रहते है,दुसरेके धनसे ही पुष्ट होते है तथा मलिन मन और दुष्ट हृदयवाले है,वेभी कलियुग में सप्ताहयज्ञसे पवित्र हो जाते है ||१४||
नारदजी ! अब हम तुम्हे इस विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनाते है.उसके सुननेसे ही सब पाप नस्त हो जाते है ||१५|| पूर्वकाल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था | वहा सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्मो का आचरण करते हुए सत्य और सत्यकर्म में ही तत्पर रहते थे ||१६|| उस नगरमें समस्त वेदोंका विशेषज्ञ और श्रौत-स्मार्त कर्म में निपुण एक आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था ,वह साक्षात् दुसरे सूर्यके समान तेजस्वी था ||१७|| वह धनि होने पर भी भिक्षा जीवी था | उसकी प्यारी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुंदरी होने पर भी सदा अपनी बात पर अड़ जाने वाली थी ||१८|| उसे लोगो की बात करने में सुख मिलता था | स्वभाव था क्रूर | प्रायः कुछ-न-कुछ बकवाद करती रहती थी | गृहकार्यमें निपुण थी ,कृपन थी,और थी झगडालू भी ||१९|| इस प्रकार ब्राह्मण दम्पति प्रेमसे अपने घर में रहते और vihar करते थे | उनके पास अर्थ और भोग-विलास की सामग्री बहुत थी | घर-द्वार भी सुन्दर थे परन्तु उससे उन्हें सुख नहीं था ||२०|| जब अवस्था बहुत ढल गयी,तब उन्हों ने संतान के लिए तरह-तरह के पुण्यकर्म आरम्भ किये और वे दिन दुखियो को गौ,पृथ्वी,सुवर्ण और वस्त्रादि दान करने लगे ||२१|| इस प्रकार धर्म मार्ग में उन्होंने अपना आधा धन समाप्त कर दिया ,तो भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसीका भी सुख देख ने को न मिला | इसलिए वह ब्राह्मण बहुत चिंतातुर रहने लगा ||२२|| एक दिन वह ब्राह्मण देवता बहुत दुखी होकर घरसे निकल कर वन को चल दिया | दोपहर के समय उसको प्यास लगी,इसलिए वह एक तालाब पर आया ||२३|| संतान के अभावके दुःखने उसके शरीर को बहुत सुखा दिया था,इसलिए थक जाने के कारन जल पीकर वह वही बैठ गया | दो घडी बीतने पर वहा एक संन्यासी महात्मा आये ||२४|| जब ब्राह्मण देवता ने देखा की वे जल पी चुके है,तब वह इनके पास गया और चरणों में नमस्कार करने के बाद सामने खड़े होकर लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा ||२५||
संन्यासी ने पूछा:--कहो ब्राह्मणदेवता ! रोते क्यों हो ? ऐसी तुम्हे क्या भारी चिंता है ? तुम जल्द ही मुझे अपने दुःखका कारण बताओ ||२६||
ब्राह्मण ने कहा:--महाराज ! मैं अपने पूर्वजन्मके पापोसे संचित दुःखका क्या वर्णन करू ? अब मेरे पिटर मेरे द्वारा दी गयी जलांजलिके जलको अपनी चिंताजनित साँस से कुछ गरम करके पीते है ||२७|| देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ प्रसन्न होकर मन से स्वीकार नहीं करते | संतान के लिए मैं इतना दुखी हो गया हूँ की मुझे सब सुना-ही-सुना दिखाई देता है | मैं प्राण त्याग ने के लिए यहाँ आया हूँ ||२८|| संतानहिन् जीवन को धिक्कार है ,संतानहिन् गृहको धिक्कार है ! संतानहीन धनको दिक्कर है और संतानहीन कुल को धिक्कार है !! ||२९|| मैं जिस गाय को पालता हूँ ,वह भी सर्वथा बाँज हो जाती है; जो पेड़ लगाता हूँ, उस पर भी फल-फुल नहीं लगते ||३०|| मेरे घर में जो फल आता है वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है | जब मैं एसा अभागा और पुत्रहिन हूँ ,तब फिर इस जीवन को ही रख कर मुझे क्या करना है ||३१|| यों कहकर वह ब्राह्मण दुःख से व्याकुल होकर उन संन्यासी महात्मा के पास फुट-फुटकर रोने लगा | तब उन यतिवरके ह्रदयमें बड़ी करुना उत्पन्न हुई ||३२|| वे योगनिष्ट थे; उन्हों ने उसकी ललाटकी रेखाए देखकर सारा वृतांत जान लिया और उसे विस्तारपूर्वक कहने लगे ||३३||
संन्यासी ने कहा:-- ब्राह्मणदेवता ! इस प्रजाप्राप्ति का मोह त्याग दो | कर्मकी गति प्रबल है,विवेकका आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़ दो ||३४|| विप्रवर ! सुनो; मैंने इस समय तुम्हारा प्रारब्ध देखकर निश्चय किया है की सात जन्मतक तुम्हारे कोई संतान किसी प्रकार नहीं हो सकती ||३५|| पूर्वकालमें राजा सगर को एवं अंगको संतानके कारण दुःख भोगना पड़ा था | ब्राह्मण !अब तुम कुटुम्ब की आशा छोड़ दो | संन्यास में ही सब प्रकार का सुख है ||३६||
ब्राह्मण ने कहा:--महात्माजी ! विवेकसे मेरा क्या होगा | मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिये; नहीं तो मैं आपके सामने ही शोकमुर्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ ||३७|| जिसमे पुत्र-स्त्री अदि का सुख नहीं है,ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है | लोक मैं तो सरस पुत्र-पौत्रदिसे भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है ||३८||
ब्राह्मण का ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधनने कहा, "विधाता के लेखको मिटाने का हठ करने से राजा चित्रकेतुको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा था ||३९|| इसलिए देव जिसके उद्योग को कुचल देता है,उस पुरुष के समान तुम्हे भी पुत्रसे सुख नहीं मिल सकेगा | तुमने जो बड़ा हठ पकड़ रखा है और अर्थी के रूप में तुम मेरे सामने उपस्थित हो; ऐसी दशामे मैं तुमसे क्या कहूँ ||४०||
जब महात्माजी ने देखा की वह किसी प्रकार अपना आग्रह नहीं छोड़ता,तब उन्हों ने उसे एक फल देकर कहा---"इसे तुम अपनी पत्नी को खिला देना,इससे उसके एक पुत्र होगा ||४१|| तुम्हारी स्त्री को एक साल तक सत्य,शौच,दया,दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखना चाहिए | यदि वह ऐसा करेगी तो बालक बहुत शुध्ध स्वाभाव का होगा ||४२||
यों कहकर वे योगिराज चले गए और ब्राह्मण अपने घर लौट आया | वहा आकर उसने वह फल अपनी पत्नीके हाथ में दे दिया और स्वयं कही चला गया ||४३|| उसकी स्त्री तो कुटिल स्वाभाव की थी ही ,वह रो-रोकर अपनी एक सखी से कह ने लगी मैं यह फल नहीं खाऊँगी ||४४|| फल खाने से गर्भ रहेगा और गर्भ से पेट बढ़ जाएगा | फिर कुछ खाया-पिया जाएगा नहीं इससे मेरी शक्ति क्षीण हो जायेगी; तब बता,घरका धंधा कैसे होगा ? ||45||
और-दैववश-यदि कही गाँवमें डाकुओका आक्रमण हो गया तो गर्भिणी स्त्री कैसे भागेगी | यदि शुकदेवजी की तरह यह गर्भ भी पेट मे ही रहा गया तो इसे बाहर कैसे निकला जाएगा ||४६|| और कहीं प्रसवकालके समय वह टेढ़ा हो गया तो प्राणोंसे ही हाथ धोना पड़ेगा | यों भी प्रसवके समय बड़ी भयंकर पीड़ा होती है; मैं कुमारी भला यह सब कैसे सह सकूँगी ? ||४७|| मैं जब दुर्बल पड़ जाउंगी,तब नंदरानी आकर घर का सब मॉल-मत्ता समेट ले जायेगी | और मुझसे तो सत्य-शौच आदि नियमो का पालन होना भी कठिन ही जान पड़ता है ||४८|| जो स्त्री बच्चा जनती है,उसे उस बच्चेके लालन-पालनमें भी बड़ा कष्ट होता है | मेरे विचार से वन्ध्या या विधवा स्त्रीया ही सुखी है ||४९||
मनमे ऐसे ही तरह-तरहके कुतर्क उठ ने से उसने वह फल नहीं खाया और जब उसके पति ने पूछा--"फल खा लिया ?"तब उस ने कहा-- "हाँ, खा लिया" ||५०|| एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी;तब उसने अपनी बहन को सारा वृतांत सुनाकर कहा की 'मेरे मनमे इसकी बड़ी चिंता है ||५१|| मैं इस दुःख के कारण दिनोदिन दुबली हो रही हूँ | बहिन ! मैं क्यां करूँ ?' 'मेरे पेट में बच्चा है ,प्रसव होने पर वह बालक मैं तुजे दे दूंगी ||५२|| तबतक तू गर्भवती के समान घर में गुप्तरूप से सुख से रह | तू मेरे पति को कुछ धन दे देंगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे ||५३|| हम ऐसी युक्ति करेंगी की सब लोग यही कहे की 'इसका बालक छः महीने का होकर मर गया' और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालक का पालन-पोसन करती रहूंगी ||५४|| तू इस समय इसकी जांच करने के लिए यह फल गौको खिला दे |' ब्राह्मणी ने स्त्रीस्वभाववश जो-जो उसकी बहन ने कहा था ,वैसे ही सब किया ||55|| इसके पश्चात समयानुसार जब उस स्त्री को पुत्र हुआ, तब उसके पिता ने चुपचाप लाकर उसे धुन्धुलीको दे दिया ||५६|| और उसने आत्मा देव को सुख पूर्वक सुचना दे दी की मेरे सुख पूर्वक बालक हो गया है | इस प्रकार आत्मादेव को पुत्र हुआ सुनकर सब को बड़ा आनंद हुआ ||५७|| ब्राह्मण ने उसका जातकर्म करके ब्राह्मणोंको दान दिया औरउसके द्वारपर गाना-बजाना तथा अनेक प्रकार के मांगलिक कृत्य होने लगे ||५८|| धुन्धुली ने अपने पति से कहा ,'मेरे स्तनों में दूध ही नहीं है,फिर गौ आदि किसी अन्य जिव के दूध से मैं इस बालक का किस प्रकार पालन करुँगी ?' ||५९|| मेरी बहिन को अभी बालक हुआ था,वह मर गया है;उसे बुलाकर अपने यहाँ रख ले तो वह आपके इस बच्चे का पालन-पोषण कर लेंगी ||६०|| तब पुत्र की रक्षा के लिए आत्मदेव ने वैसा ही किया तथा माता-धुन्धुली ने उस बालक का नाम धुन्धुकारी रखा ||६१||
इसके बाद तिन महीने बीतने पर उस गौके भी एक मनुष्याकार बच्चा हुआ | वह सर्वांग सुन्दर ,दिव्य,निर्मल तथा सुवर्ण सी कान्तिवाल सा था ||६२|| उसे देखकर ब्राह्मणदेवता को बड़ा आनंद हुआ और स्वयं ही उसके सारेस्कार किये | इस समाचार से और सब लोगो को भी बड़ा ही आश्चर्य हुआ और वे बालक को देखने को आये ||६३|| तथा आपस मैं कहने लगे ,'देखो, भाई ! अब आत्मदेव का कैसा भाग्य उदय हुआ है | कैसे आश्चर्य की बात है की गौके भी ऐसा दिव्य रूप बालक उत्पन्न हुआ है' ||६४|| दैवयोगसे इस गुप्त रह्स्यका किसी को बता नहीं लगा | आत्मदेव ने उस बालकके गौके-से कान देखकर उसका नाम "गोकर्ण" रखा ||६५||
कुछ काल बीतने पर वे दोनों बालक जवान हो गए | उनमे गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ,किन्तु धुन्धुकारी बड़ा ही बड़ा ही दुष्ट निकला ||६६|| स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारो का उसमे नाम भी न था और न खानपान का ही कोई परहेज था | क्रोध उसमे बहुत बढ़ा चढ़ा था | व बुरी-बुरी वस्तुओका संग्रह किया करता था | मुर्दे के हाथ से छुआया हुआ अन्न भी खा लेता था ||६७|| दुसरोकी चोरी करना और सब लोगो से द्वेष बढ़ाना उसका स्वाभाव बन गया था | छिपे-छिपे वह दुसरो के घरो में आग लगा देता था | दूसरो के बालकोको खेलाने के लिए गोदमें लेता और उन्हें चाट कुए में डाल देता ||६८|| हिंसाका उसे व्यसन सा हो गया था | हर समय वह अस्त्र-सस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दिन-दुखियो को व्यर्थ तंग करता | चंडालोसे उसका विशेष प्रेम था ;bas,हाथमे फंदा लिए कुत्तो की टोली के साथ शिकार्की टोहमें घूमता रहता ||६९|| वेश्याओके जालमें फसकर अपने पिता की सारी सम्पत्ति नष्ट कर दी | एक दिन माता-पिता को मार-पिट कर घर के सब बर्तन उठा लेगया ||७०||
इस प्रकार जब सारी संपत्ति स्वाहा हो गयी,तब उसका पिता फुट-फुटकर रोने लगा और बोला--"इससे तो इसकी माका बाँझ रहना ही अच्छा था ;कुपुत्र तो बड़ा ही दुखदायी होता है ||७१|| अब मैं कहाँ रहूँ ? कहाँ जाऊं ? मेरे इस संकट को कौन काटेगा ? हाय ! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है,इस दुःख के कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ ने पड़ेंगे ||७२|| उसी समय परमज्ञानी गोकर्ण जो वहा आये और उन्हों ने पिता को वैराग्यका उपदेश करते हुए बहुत समझाया ||७३|| वे बोले,"पिताजी ! यह संसार असार है| यह अत्यंत दुःख रूप और मोह में डालने वाल है | पुत्र किसका ? धन किसका ? स्नेहवान पुरुष रात-दिन दीपकके समान जलता रहता है ||७४|| सुख न तो इन्द्र को है और न चक्रवर्ती राजा को ही;सुख है तो विरक्त,एकांतजीवी मुनि को ||७५|| 'यह मेरा पुत्र है' इस अज्ञान को छोड़ दीजिये | मोह से नरक की प्राप्ति होती है | यह शरीर तो नष्ट होगा ही | इसलिए सबकुछ छोड़कर वन में चले जाइये ||७६||
गोकर्ण के वचन सुनकर आत्मदेव वनमें जाने के लिए तैयार होया गया और उनसे कहने लगा, "बेटा ! वन में रहकर मुझे क्या करना चाहिए, यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो ||७७|| मैं बड़ा मुर्ख हूँ,अबतक कर्मवश स्नेह-पाशमे बंधा हुआ अपंग की भाती इस घररूप अँधेरे कुएमे ही पड़ा रहा हूँ | तुम बड़े दयालु हो, 'इससे मेरा उद्धार करो ' ||७८||
गोकर्ण ने कहा:--पिताजी ! यह शरीर हड्डी,मांस और रुधिर का पिण्ड है; इसे आप 'मैं' मानना छोड़ दे और स्त्री-पुत्रादि को कभी अपना न माने | इस संसार को रात-दिन क्षणभंगुर देखे,इसकी किसी भी वास्तु को स्थायी समझकर उसमे राग न करे | बस, एक मात्र वैराग्य-रसके रसिक होकर भगवानकी भक्तिमें लगे रहे ||७९|| भगवद भजन ही सबसे बड़ा धर्मं है,निरंतर उसीका आश्रय लिए रहे | अन्य सब प्रकार के लौकिक धरनों से मुख मोड़ ले | सदा साधु जनों की सेवा करे | भोगोकी लालसाओ को पास न भटक ने दे तथा जल्दी-से-जल्दी दुसरोके गुण-दोषोंका विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान की कथाओके रस का ही पान करे ||८०||
इस प्रकार पुत्र की वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेव ने घर छोड़ दिया और वन की यात्रा की | यद्यपि उसकी आयु उस समय साठ वर्षकी हो चुकी थी,फिर भी बुध्धि में पूरी दृढ़ता थी | वह रात-दिन भगवान की सेवा-पूजा करने से और नियमपूर्वक भगवतके दशमस्कंधका पाठकरने से उसने भगवान श्रीकृष्णचन्द्रको प्राप्त कर लिया ||८१||
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