तीसरा अध्याय
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भगवान् के अवतारोका
वर्णन
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श्रीसूतजी कहते है:—सृष्टिके आदिमे भगवान् ने लोकोके निर्माणकी इच्छा की | इच्छा होते हि उन्होने महतत्व आदिसे निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया | उसमे दस इन्द्रिया,एक मन और पांच भुत—ये सोलह कलाए थी ||१|| उन्होंने कारण-जलमे शयन करते हुए जब योगनिंद्राका विस्तार किया ,तब उनके नाभि-सरोवरमेंसे एक कमल प्रगट हुआ और उस कमलसे प्रजापतियोंके अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ||२|| भगवान् के उस विराटरूप के अंग-प्रत्यांग्मे ही समस्त लोकोकी कल्पना की गयी है,वह भगवान् विशुध्ध सत्वमय श्रेष्ट रूप है ||३|| योगी लोग दिव्यदृष्टि से भगवान् के उस रूपका दर्शन करते है | भगवानके वह रूप हज़ारो पैर,जांघे ,भुजाये और मुखोके कारण अत्यंत विलक्षण है ; उसमे सहस्र सिर , हज़ारो कान,हज़ारो आँखे और हज़ारो नासिकाए है | हज़ारो मुकुट,वस्त्र और कुंडल आदि आभूषण से वह उल्लासित रहता है ||४|| भगवान् का यही पुरुष रूप ,जिसे नारायण कहते है ,अनेक अवतारों का अक्षय कोष है—इसीसे सारे अवतार प्रगट होते है | इस रूपके छोटे-से-छोटे अंश से देवता,पशु-पक्षी और मनुष्यादी योनियोकी सृष्टि होती है ||५||
उन्ही प्रभुने पहले कौमारसर्ग में सनक,सनंदन , सनातन और
उन्ही प्रभुने पहले कौमारसर्ग में सनक,सनंदन , सनातन और